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श्राद्ध या पिंडदान कितने प्रकार के है श्राद्ध या पिंडदान क्यो करना चाहिए

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श्राद्ध या पिंडदान कितने प्रकार के है श्राद्ध या पिंडदान क्यो करना चाहिए

श्राद्ध या पिंडदान के महत्व विषय के लिए अवश्य पढ़े

पितरों की संतुष्टि के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले तर्पर्ण, ब्राह्मण भोजन, दान आदि कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है। इसे पितृयज्ञ भी कहते हैं। श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है।

श्राद्ध या पिंडदान दोनो एक ही शब्द के दो पहलू है पिंडदान शब्द का अर्थ है अन्न को पिन्डाकार मे बनाकार पितर को श्रद्धा पूर्वक अर्पण करना इसी को पिंडदान कहते है दझिण भारतीय पिंडदान को श्राद्ध कहते है।

श्राद्ध के प्रकार

शास्त्रों में श्राद्ध के निम्नलिखित प्रकार बताये गए हैं –

  1. नित्य श्राद्ध : वे श्राद्ध जो नित्य-प्रतिदिन किये जाते हैं, उन्हें नित्य श्राद्ध कहते हैं। इसमें विश्वदेव नहीं होते हैं।
  2. नैमित्तिक या एकोदिष्ट श्राद्ध : वह श्राद्ध जो केवल एक व्यक्ति के उद्देश्य से किया जाता है। यह भी विश्वदेव रहित होता है। इसमें आवाहन तथा अग्रौकरण की क्रिया नहीं होती है। एक पिण्ड, एक अर्ध्य, एक पवित्रक होता है।
  3. काम्य श्राद्ध : वह श्राद्ध जो किसी कामना की पूर्ती के उद्देश्य से किया जाए, काम्य श्राद्ध कहलाता है।
  4. वृद्धि (नान्दी) श्राद्ध : मांगलिक कार्यों ( पुत्रजन्म, विवाह आदि कार्य) में जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि श्राद्ध या नान्दी श्राद्ध कहते हैं।
  5. पावर्ण श्राद्ध : पावर्ण श्राद्ध वे हैं जो भाद्रपद कृष्ण पक्ष के पितृपक्ष, प्रत्येक मास की अमावस्या आदि पर किये जाते हैं। ये विश्वदेव सहित श्राद्ध हैं।
  6. सपिण्डन श्राद्ध : वह श्राद्ध जिसमें प्रेत-पिंड का पितृ पिंडों में सम्मलेन किया जाता है, उसे सपिण्डन श्राद्ध कहा जाता है।
  7. गोष्ठी श्राद्ध : सामूहिक रूप से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे गोष्ठीश्राद्ध कहते हैं।
  8. शुद्धयर्थ श्राद्ध : शुद्धयर्थ श्राद्ध वे हैं, जो शुद्धि के उद्देश्य से किये जाते हैं।
  9. कर्मांग श्राद्ध : कर्मांग श्राद्ध वे हैं, जो षोडश संस्कारों में किये जाते हैं।
  10. दैविक श्राद्ध : देवताओं की संतुष्टि की संतुष्टि के उद्देश्य से जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें दैविक श्राद्ध कहते हैं।
  11. यात्रार्थ श्राद्ध : यात्रा के उद्देश्य से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे यात्रार्थ कहते हैं।
  12. पुष्टयर्थ श्राद्ध : शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक पुष्टता के लिये जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें पुष्टयर्थ श्राद्ध कहते हैं।
  13. श्रौत-स्मार्त श्राद्ध : पिण्डपितृयाग को श्रौत श्राद्ध कहते हैं, जबकि एकोदिष्ट, पावर्ण, यात्रार्थ, कर्मांग आदि श्राद्ध स्मार्त श्राद्ध कहलाते हैं।

कब किया जाता है श्राद्ध?

श्राद्ध की महत्ता को स्पष्ट करने से पूर्व यह जानना भी आवश्यक है की श्राद्ध कब किया जाता है। इस संबंध में शास्त्रों में श्राद्ध किये जाने के निम्नलिखित अवसर बताये गए हैं –

  1. भाद्रपद कृष्ण पक्ष के पितृपक्ष के 16 दिन।
  2. वर्ष की 12 अमावास्याएं तथा अधिक मास की अमावस्या।
  3. वर्ष की 12 संक्रांतियां।
  4. वर्ष में 4 युगादी तिथियाँ।
  5. वर्ष में 14 मन्वादी तिथियाँ।
  6. वर्ष में 12 वैध्रति योग
  7. वर्ष में 12 व्यतिपात योग।
  8. पांच अष्टका।
  9. पांच अन्वष्टका
  10. पांच पूर्वेघु।
  11. तीन नक्षत्र: रोहिणी, आर्द्रा, मघा।
  12. एक कारण : विष्टि।
  13. दो तिथियाँ : अष्टमी और सप्तमी।
  14. ग्रहण : सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण।
  15.  मृत्यु या क्षय तिथि।

क्यों आवश्यक है श्राद्ध?

श्राद्धकर्म क्यों आवश्यक है, इस संबंध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं –

  1. श्राद्ध पितृ ऋण से मुक्ति का माध्यम है।
  2. श्राद्ध पितरों की संतुष्टि के लिये आवश्यक है।
  3. महर्षि सुमन्तु के अनुसार श्राद्ध करने से श्राद्धकर्ता का कल्याण होता है।
  4. मार्कंडेय पुराण के अनुसार श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितर श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, संतति, धन, विघ्या, सभी प्रकार के सुख और मरणोपरांत स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं।
  5. अत्री संहिता के अनुसार श्राद्धकर्ता परमगति को प्राप्त होता है।
  6.  यदि श्राद्ध नहीं किया जाता है, तो पितरों को बड़ा ही दुःख होता है।
  7.  ब्रह्मपुराण में उल्लेख है की यदि श्राद्ध नहीं किया जाता है, तो पितर श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को शाप देते हैं और उसका रक्त चूसते हैं। शाप के कारण वह वंशहीन हो जाता अर्थात वह पुत्र रहित हो जाता है, उसे जीवनभर कष्ट झेलना पड़ता है, घर में बीमारी बनी रहती है।

श्राद्ध-कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही करें

पित्रु कार्य कारतीक या चैत्र मास मे भी कीयाजा सकता है 💐💐💐 💐💐💐 मातृदेवो भव पितृदेवो भव

(PANDIT  RAMDEO PANDEY -RANCHI, INDIA ● WHATTSAPP – 8877003232)

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साल में कितने नवरात्र एक दो या पांच, जानिए नवरात्र उपासना का महत्‍व

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साल में कितने नवरात्र एक दो या पांच, जानिए नवरात्र उपासना का महत्‍व

नवरात्र का पावन महीने साल में दो बार आता है। सीधा सीधा कहें तो एक बार मार्च-अप्रैल महीने में, दूसरी बार सितंबर-अक्टूबर महीने में… नवरात्र के 9 दिनों में हम मां दुर्गा के 9 रूपों की अराधना करते हैं। घरों में कलश की स्थापना होती है। अखंड ज्योत जलती है। मांस-मदिरा से परहेज किया जाता है। यही नहीं, प्याज लहसुन का इस्तेमाल भोजन के लिए नहीं किया जाता है।

जो लोग साल में दो बार नवरात्र होने के सवाल का जवाब चाहते हैं, उन्हें ये जानकर और भी हैरानी होगी कि नवरात्र पांच बार होते हैं जिन्हें हम गुप्त नवरात्र के नाम से भी जानते हैं। हांलाकि इन्हें मानते बहुत कम लोग हैं। ज्यादातर लोग दो ही नवरात्र मानते हैं। एक नवरात्रि गर्मी की शुरुआत पर चैत्र माह में और दूसरा शीत की शुरुआत पर आश्विन माह में पड़ता है।

गर्मी और सर्दी के मौसम में जो ऊर्जा हमें सबसे अधिक प्रभावित करती है, वो सौर-ऊर्जा है। फसल पक जाने के बाद कई शुभ कार्य किए जाते हैं। ये दोनों माह ऐसे हैं जब मौसम बेहद अनुकूल होता है। यही वजह है कि पवित्र शक्तियों की आराधना करने के लिए यह समय सबसे अच्छा माना जाता है। प्रकृति में बदलाव के कारण हमारा अंतर्मन भी बदलावों के दौर से गुजरता है। यही वजह है कि शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए इस दौरान उपवास रखकर देवी की उपासना की जाती है। एक बार इसे सत्य और धर्म की जीत के रूप में मनाते हैं जबकि दूसरी बार भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में।

दोनों नवरात्र हमेशा मौसम के बदलने के साथ ही मनाए जाते हैं। गर्मियों में आने वाले नवरात्र में मौसम सर्दी से गर्मी की तरफ बढ़ रहा होता है और इसी दौरान हमारे शरीर में भी ढेर सारे बदलाव होते हैं। इन बदलावों को शरीर पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े इसलिए हम मां दुर्गा के 9 रूपों की अराधना करते हैं। चूंकि हिंदू धर्म के सभी रीति रिवाज और मान्यताएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर केंद्रित हैं इसलिए इस दौरान भी दिन और रात बराबर होते हैं। मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर के बीच, दिन और रात की अवधि लगभग एक जैसी यानी बराबर होती है। यही कारण है कि नवरात्र इस वक्त मनाए जाते हैं।

हिंदू पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की थी इसीलिए सर्दी के वक्त मनाये जाने वाले नवरात्र को हम रामनवमी के नाम से भी जानते हैं।

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महालया, दुर्गा पूजा और नवरात्र 2017 का शुभ मुहूर्त जानिये पंडित रामदेव पांडेय से 

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महालया, दुर्गापूजा और नवरात्र 2017 का शुभ मुहूर्त जानिये पंडित रामदेव पांडेय से 

रांची। बीस साल बाद ऐसा संयोग कि महालया के एक दिन बाद कलशस्थापन होगा,  मंगलवार को अमावस दिन 11:55 से है जो बुधवार दोपहर 10:22 तक होगा,  इसलिए अमावस श्राद्ध मंगलवार को ही समाप्त हो जायेगा, पं रामदेव पाण्डेय के अनुसार श्राद्ध मध्याहन काल मे होता है, उदय सूर्योदय के तिथि का मान श्राद्ध में नहीं लिया जाता है, बुधवार को केवल स्नान-दान का काम होगा, इस दिन लोग अपनी नानी के लिऐ सिर्फ श्राद्ध दान कर सकते है,  गुरूवार को शारदीय नवरात्र का कलश स्थापन होगा, इस दिन प्रतिपदा सुबह 9:59 मिनट तक है, इसके बाद द्वितीया होता है परन्तु हस्ता नक्षत्र रात 12:09 तक और शुक्ल योग दिन 11:09 तक होने से कलशस्थापन  दिन भर किया जा सकता है।

क्या है महालया

नवरात्र के शुरू होने के पूर्व दिन को महालया होता है, इसलिए पितृ पक्ष का विसर्जन होता है, बिहार-बंगाल में महालया के दिन से दुर्गा सप्तशती (चण्डीपाठ) के मूल श्लोक का पाठ शुरू भी होता है, परन्तु कलश स्थापना गुरूवार से होगा।

दुर्गा पूजा, नवरात्र 2017  – कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त :- 21 सितंबर  2017 –  गुरूवार

आगमण- डोला -फल अशुभ

ब्रह्म मुहूर्त – सुबह – 3 :00 से 10 :00  तक , पूरा दिन

शुभ  चोघडिया –

सभी के लिए-    शुभ  –     सुबह    से      7:46 – तक

व्यापारियो के लिए-  लाभ –   12:20 से 1:52   -तक

कारपोरेट के लिऐ -अमृत –    1:52   से  3:23      -तक

साधको के लिए  – काल  –  शाम-   3:23  से 4:55   – तक

सर्वजन के लिऐ – शुभ  – शाम   4:55   से  6:24     -तक

अभिजित  मुहूर्त- दोपहर -11:36 से 12 :24

नोट : प्रतिपदा    गुरूवार  सुबह  -10:00 तक,  हस्ता नक्षत्र गुरू वार रात 12: 11 तक है ,शुक्ल  योग  दिन  11 :02  तक है।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त प्रात: 3: 00 से 6 : 15 बजे तक

अमृत – सुबह 6:00 से 8 :24 तक

प्रथम बेला  :- 8:24 से 10:15 तक

अभिजित – दोपहर -11:36 से 12:24 तक

।। पूजा पण्डालो की नवरात्र पूजन कार्यक्रम ।।

शारदीय नवरात्रि 2017  – कार्यक्रम 10 दिन का नवरात्रि है।

21 सितंबर  – गुरूवार –

प्रतिपदा – कलश स्थापना- सुबह 6:30,  ध्वजारोपन, दिन भर, – शैल पुत्री पूजन, सुबह आरती – 9 :00 //  शाम आरती 8 :00 ( महाराजा अग्रसेन जयन्ती)

22 सितंबर शुक्रवार  – द्वितीया

( ब्रह्म चारिणी पूजन )- मुहर्रम 1-1439 शुरू

23 सितंबर  शनिवार – तृतीया  –

( सुबह 19 :50 तक )चन्द्रघन्टा पूजन

। सुबह आरती – 9 :00 //  शाम आरती 8 :00

24 सितंबर रविवार- – चतुर्थी

(दिन 011:46 तक )

कुष्माण्डा पूजन

सुबह आरती – 9 :00 //  शाम आरती 8:00

25 सितम्बर- सोमवार  – पँचमी –

( दिन 01:30  तक)

कात्यायनी पूजन।

26 सितंबर मगलवार – महाषष्ठी-

(  दिन 03:20 तक  ,कालरात्रि पूजन ।-

सुबह आरती  दिन 09:00,।शाम आरती 8:00

बेलवरण शाम – 5:50 बजे से

आगमन-  घोडा पर – अशुभ फल

27 सितंबर बुधवार  – महासप्तमी

(शाम  5 :26 तक)

ज्येष्ठा  दिन – 09 :42 तक

नवपत्रिका प्रवेश सुबह – 7 :00 से

सभी प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा होगी

,आरती *पुष्पाजलि शाम 12 :00 /  शाम आरती 8:00 ।

सांस्कृतिक कार्यक्रम-

28 सितम्बर गुरुवार – महाअष्टमी – 

(रात -07 :26  तक)

महाअष्टमी पूजा  -सन्धिपूजा  बलि – शाम – 7 :26 मे

(मूल- दिन -12:17 तक)

दोपहर –  आरती- पुष्पाँजलि – दोपहर- 11:00   , शाम आरती पुष्पाजलि – 8:00

सांस्कृतिक कार्यक्रम-

29 सितंबर शुक्रवार  – महानवमी- 

 

( रात  -9 :23 तक ,  पूर्षाषाढ दिन 2:47 तक)

सिद्धिदात्री पूजन।

नवमी पूजन , हवन 12:03 बजे दोपहर

आरती *पुष्पाजलि

शाम – 8:00 ।। महाभोग वितरण- दोपहर 2 :00 बजे

साँस्कृतिक कार्यक्रम रात-

30 सितम्बर शनिवार  – विजया दशमी

विजयादशमी -( रात  11:00  तक)

उतराषाढ-  शाम  -05: 0 3 तक )

विसर्जन-हवन – 10:00 से 11:30 तक

पुष्पाजँलि  आरती – सुबह – 11:40

नवरात्रि का पारण । विसर्जन

देवी प्रस्थान – पैदल पाँव – फल  विकल

नवरात्र बिशेष नव देवियो कें नाम उनकें प्रतिदिन कें भोग और तिथियो की पूरी जानकारी, इस नवरात्र में तिथिया बढ़ रही है जो की शास्त्रो कें हिसाब सें शुभ है माता का आना भी शुभ संकेत है। श्रध्दाभाव एवं विश्‍वास सें माँ की सेवा करें आप की हर मनोकामना पूरी होगी।

(1) प्रथम – कलशस्थापन  -शैलपुत्री (भोग -खीर)

(2) द्वितीया- ब्राह्मचारिणी (भोग-खीर,गाय का घी,एवं मिश्री)

(3) त्रतीया-चन्द्रघंटा (भोग-कैला,दूध,माखन,मिश्री )

(4) चतुर्थी-कुष्मांडा (भोग-पोहा,नारियल,मखाना)

(5) पंचमी-स्कन्दमाता (भोग-शहद एवं मालपुआ )खिलोना

(6) षष्टी-कात्यायनी(भोग- शहद एवं खजूर)) सुहाग सामान

(7) सप्तमी-कालरात्री (भोग-अंकुरीत चना एवं अंकुरित मूँग )

(8) अष्टमी-महागौरी (भोग-नारियल,खिचड़ी,खीर )

(9) नवमी -सिध्दीदात्री (भोग-चूड़ा दही,पेड़ा,हलवा,,)

(10 ) दशमी – धान का लावा

Pandit Ramdeo pandey (astrologer Ramdeo pandey ) – Ranchi_ India_ whatsapp 0 8877003232

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देश के हाई प्रोफाइल मोस्‍ट वांटेड ढोंगी बाबा, इनके खिलाफ दर्ज हैं कई संगीन मामले

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देश के हाई प्रोफाइल मोस्‍ट वांटेड ढोंगी बाबा, इनके खिलाफ दर्ज हैं कई संगीन मामले
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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने 14 नकली बाबाओं की लिस्ट जारी की है। इसमें आसाराम उर्फ आशुमल शिरमानी, सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां, सचिदानंद गिरी उर्फ सचिन दत्ता, गुरमीत राम रहीम डेरा सच्चा सिरसा, ओम बाबा उर्फ विवेकानंद झा, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, इच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी असीमानंद, ऊं नम: शिवाय बाबा, नारायण साईं, रामपाल, खुशी मुनि, बृहस्पति गिरि और मलकान गिरि समेत कुल 14 नाम शामिल हैं। इनमें से किसी पर मर्डर का आरोप है, तो कोई रेप का दोषी है। लेकिन ये अपने श्रद्धालुओं के बीच काफी प्रसिद्ध रहे हैं। फिर चाहे वो गुरमीत राम रहीम हों या आसाराम।

14 नकली बाबाओं की लिस्ट

आसाराम: आसाराम ने अपने धर्म की दुकान गुजरात के अहमदाबाद से शुरू की। धर्म का सहारा लेकर इन्होंने अरबों का साम्राज्य खड़ा किया है। साल 2013 से ये नाबालिग शिष्या से रेप के आरोप में जेल में बंद हैं।

इनपर आरोप है कि ये आशीर्वाद देने के नाम पर नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण और बलात्कार करते थे। हालांकि अब तक इनपर आरोप सिद्ध नहीं हो पाया है।

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